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गागर में सागर

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हम एक पल भी सांस रोकने की कोशिश भी करते हैं तो अत्याधिक घबराहट होने लगती हैं किंतु साधना में अनलोम विलोम प्राणायाम के समय ध्यान में लीन होने लगते हैं, कहते हैं जैसी संगत वैसा फल साधना में हम अंदर बैठे मित्र से वार्तालाप करते हैं वह हमें गहराई में और गहराई में शून्य से महाशून्य तक ले जाते हैं वहां जाकर जाना है कई तरह की धुन और प्रकाश और भी दिव्य अनुभव होते हैं हमारा प्यारा लाला कान्हा जो न दिखाए कम है साहस रखिए मै आपको डरा नहीं रहा हूं बहुत कुछ जाना और समझा है सात्विक भोजन करें और सकारात्मक विचार भी रखिए

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भक्त औरभगवान

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ईश्वर है ये कथन इस संसार में प्रत्येक जीव को अहसास होता है मनुष्य ही है जो इसे गंभीर रूप से नहीं लेता पाप और अत्याचार ज्यादा होने के कारण हम दुख और तकलीफ भोगते हैं परिवार में यदि एक व्यक्ति भी अनाचार करता है तो दूर बैठा निकट संबधी भी दुखी होता रहता है, संसार का यही नियम है, ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे Radhe Radhe ❤️ oshriRadhekrishnaBole ❤️🔥

तू बैठा अंदर मै खोजू गली गली

भ्रम में जीता अहम अक्सर भटकता ही रहता है, जब भी कोई साधक अपने ईष्ट देव को प्रसन्न करने के लिए तरह तरह के प्रयास करता है, अंदर बैठा परमात्मा कहता है उड़ ले बेटा उड़ ले कितना उड़ना है होना वही है जो मैने सोचा है, ठीक उसी तरह आपने देव ऋषि नारद जी की मोह की कथा सुनी है, नारद जी का मोह भंग करने के लिए श्री मद नारायण ने एक अदभुत माया रची थी राम चरित्र मानस के बाल काण्ड में नारद मोह के नाम से सुना और गाया जाता है

माया पति ने संसार को और अपने भक्त को रास्ते में लाने के लिए एक सुंदर माया नगरी बनाई वहां के राजा की पुत्री विश्व मोहनी (लक्ष्मीजी)के  स्वयंवर की तैयारी चल रही थी नारद जी के पहुंचने पर राजा स्वयं स्वागत के लिए द्वार पर आ गए नारद जी को सम्मान पूर्वक राजमहल में अंदर जहां राजकुमारी थी आदर पूर्वक आसन देकर बैठाया गया राजकुमारी ने आकर प्रणाम किया राजा बोले कृपया कन्या का हाथ देखकर बताए उसे कैसा वर मिलेगा, हाथ देखकर नारद जी स्वयं आश्चर्य चकित रह गए उन्होने थोड़े शब्दो में उतर दिया कन्या भाग्यशाली हैं इसका विवाह जिस भी व्यक्ति से होगा वह बहुत धनवान होगा यह कहकर नारद जी आगे बढ़ गए मार्ग में चलते हुए वे सोचने लगे इस कन्या का विवाह जिस भी व्यक्ति से होगा वह ब्रह्मांड में सबसे अधिक लोकप्रिय और धनी व्यक्ति होगा, क्यों न मैं भी अपना भाग्य विधाता दीन दयाल श्री हरि नारायण से उनके जैसा रूप मांग लूं राजकुमारी मुझे देखते ही मोहित हो जाए और वरमाला डाल दें मन ही मन नारद जी श्री हरि नारायण से प्रार्थना करने लगे हे भगवान मुझे कुछ दिनों के लिए आप जैसा रूप देदो ताकि मेरा विवाह हो जाए मेरा भी घर परिवार बस जाए, श्री हरि मुस्कराए और बोले नारद जी मैं वही करूंगा जो तुम्हारे लिए उचित होगा, यह सुनकर नारद जी गदगद हो गए

भोले भंडारी बाबा श्री हरि नारायण की यह लीला देख रहे थे उन्होने अपने दो गण श्री नारद मुनि के पीछे छोड़ दिए की पूरे घटना क्रम की जानकारी देते रहे, स्वयंवर के दिन श्री नारद जी पूरी तैयारी के साथ राजदरवार मे पहुंच गए उन्होने चारों तरफ नजर डाली एक आसन पर बैठ गए कुछ ही देर में राजकुमारी हाथ में वरमाला लेकर सखियों के साथ कदम रखा नारद जी मन ही प्रसन्न होकर खड़े हो गए राजकुमारी ने उन पर दृष्टि भी नहीं डाली और आगे निकल गई नारद जी बहुत बैचैन हुए और वहीं जाकर खड़े हो गए जहां राजकुमारी जा रही थी फिर क्या था राजकुमारी ने किसी गले में वरमाला डाल दी नारद जी विह्ल होकर बाहर भागते हैं दोनों गण भी उनके पीछे बाहर आ जाते और कहते हैं जरा पानी में अपना मुख तो देख लो नारद जी पानी मुख देखने भागते वे हंसने लगते हैं पानी में अपना मुख देखते हैं उनका मुख बंदर का दिखता है फिर क्या था नारद अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं और उन्हें कहते हैं जाओ तुम भी बंदर जैसे हो जाओ और फिर यह कहते हुए आगे चलने लगते है आज मैं नारायण को छोडूंगा नहीं उनके आगे नारायण राजकुमारी के साथ जा रहे थे फिर तो वे आपा खो गए बोले अरे मैं तो तुम्हे अच्छे से जानता हूं आप हमेशा से कपटी हो आप से किसी का सुख नहीं देखा जाता मैने आप पर भरोसा किया और आप ने मेरी दुनिया ही बदल दी मैं तुम्हे श्राप देता हूं आप भी नारी विरह कि वेदना में दुखी होकर तड़पो और जो बंदर का मुख मुझे दिया है वे ही आपकी सहायता करेंगे इतना कहकर नारद जी जैसे मुख ऊपर उठाते हैं देखते क्या है न ही वहां मायानगरी है न ही राजकुमारी दोनों गण और नारायण ही खड़े हैं नारद जी विहल होकर रोने लगते हैं हे भगवान मुझसे ये क्या अनर्थ हो गया हे ईश्वर मेरा श्राप भलीभूत न हो श्री हरि नारायण मधुर स्वर में कहते हैं भक्तों में श्रेष्ठ देव ऋषि नारद आप व्यथित न हो ये मेरी ही लीला है आगे राम अवतार के लिए ही मैने यह रचना रची इतना कहकर नारायण अंतर्ध्यान हो गए पास खड़े गणों ने नारद जी कहा हे प्रभु हमारा श्राप वापस ले ले नारद जी बोले कलयुग में जब राम अवतार लेंगे तो तुम वानर सेना में रहकर उनकी सेवा करोगे

कथा का सार यह है ईश्वर अंदर बैठा है और हम उसे गली गली डूड रहे हैं

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जब भी मन कोई हलचल चलती हैं, हम भटकने लगते हैं किंतु अंदर बैठा ईश्वर हमें तत्काल आगे बड़ने का होंसला देता हैं, दुनिया हर गति को प्रवाह देने वाला हमारा हमदर्द केवल और केवल एक ही है,,